Homeजानने लायकसंस्कृति और कलालोकगीत में स्त्री का महत्व कितना है? : नीलिमा पांडे

लोकगीत में स्त्री का महत्व कितना है? : नीलिमा पांडे

भारत का समाज अपने शुरुआती चरण से ही पितृसत्तात्मक रहा है। बइस पितृसत्तात्मक समाज की तमाम मान्यताएं स्त्री में भी रूढ़ हो गई हैं। इस तथ्य को समझने और समाज में स्त्री की प्रस्थिति को रेखांकित करने में लोकगीत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हर्षोल्लास, बिरह-वेदना,करुणा,संस्कार,श्रम,देवी उपासना आदि विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों में भारतीय समाज में रूढ़ पितृसत्ता की प्रतिध्वनि निरंतर सुनाई देती है।पुरुष की श्रेष्ठता और स्त्री की निम्नता का भाव अधिकांश गीतों में मिलता है। पितृसत्ता स्त्री की स्वतंत्र छवि के प्रति दुराग्रह रखती है और उसे दोयम दर्जे का नागरिक मानती है।

लोकगीतों में इस दुराग्रह की पूरी बानगी मिलती है। संस्कार गीतों में यदि जन्म के समय से देखें तो पुत्र के जन्म पर सोहर गाने का उल्लेख मिलता है। पुत्री के जन्म पर कौन से गीत गाए जाएं,इसका कोई उल्लेखनीय संदर्भ लोक (सहित्य) में नही मिलता है। स्पष्ट है कि संतान की प्राप्ति हर्ष और उल्लास का विषय नहीं है,पुत्र संतान की प्राप्ति है। सोहर गीतों में पोते/भतीजे के आने की खुशी में दादी और बुआ के मनोवेगों का बहुतायत से उल्लेख मिलता है। उनके लिए पोते/भतीजे का आगमन हर्ष और जश्न का विषय है।

अनेक ऐसे गीत भी हैं जिनसे संकेत मिलता है कि कैसे पुत्र को जन्म न देने वाली स्त्री का जीवन निःसार और व्यर्थ हो जाता है। व्यर्थता का यह बोध सामाजिक मानकों पर खरा न उतारने की वजह से है। सामाजिक मानक जिनका आधार धर्मशास्त्रीय निदर्श है, ये मानते हैं कि पुत्र संतान के अभाव में व्यक्ति पितृऋण से उऋण नहीं हो पाता है और मोक्ष प्राप्ति से वंचित रह जाता है।

स्त्री (पत्नी) को अपने पति को इस ऋण से मुक्त करने और उसके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने के महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है। इस भूमिका के तहत उसे पुत्र संतान को जन्म देने का महत्वपूर्ण कार्य करना होता है। यदि वह ऐसा न कर सके तो उसकी सहधर्मिणी की भूमिका में कमी रह जात है। माना जाता है कि वह अपने गृहस्थ जीवन के उत्तरदायित्वों को भली भांति निभा नहीं पाई। इससे उसके पारिवारिक-सामाजिक प्रतिष्ठा और मान -सम्मान में कमी आ जाती है। स्त्रियां उस सामाजिक अपमान के दंश से बचने के लिए हर संभव प्रयास करती हैं। इन प्रयासों में पूजा-पाठ,टोटके,उपचार सभी कुछ शामिल हैं।

सोहर गीतों के अलावा पुत्र की अदम्य लालसा छठी गीतों में भी देखी जा सकती है।जिन स्त्रियों के पुत्र नहीं होते वे इस व्रत को विशेष रूप से रखती हैं। सूर्य को अर्घ्य देना इस व्रत का महत्वपूर्ण कर्मकांड है।स्त्रियां सूर्य निकलने से पहले ही किसी नदी या जल स्त्रोत के पास एकत्र हो जाती हैं और कई घंटे जल में खड़े होकर सूर्य के उगने की प्रतीक्षा करती हैं।अपनी इस तपस्या (शरीरिक कष्ट) के बदले वे पुत्र संतान चाहती हैं।

छठ गीतों में युवती स्त्रियां अपने लिए पुत्र की कामना करती हैं तो बूढ़ी स्त्रियाँ पौत्र की। छोटी लड़कियां भी अपने लिए भाई-भतीजे की कामना करती हैं। इन गीतों में छोटी लड़कियों का संदर्भ महत्वपूर्ण हैं। अबोध बालिकाएँ भी अपने लिए बहन-भतीजी की कामना नहीं करती हैं। समाज की मनोवृत्ति उन पर कम उम्र से ही हावी हो जाती है। सोहर और छठी गीतों के ये संदर्भ परिवार में स्त्री की स्थिति और प्रस्थिति को रेखांकित करते हुए समाज के लिंग-विभेद को प्रमाणित करते हैं।

कुछ अन्य लोकगीत जिन्हें देवी गीत कहा गया है उनकी विषय वस्तु भी समाज के इसी प्रारूप की ओर संकेत करती है। अवध क्षेत्र में गाए जाने वाले देवी गीत मुख्य रूप से देवी दुर्गा और उनके विभिन्न रूपों की प्रसंशा में गाए जाते हैं। इन गीतों में धर्म-दर्शन या पंथ की विशिष्टता का कोई उल्लेख नहीं है। ये देवी के प्रति आभार प्रकट करने और घर परिवार की सुख-शांति के लिए गए जाते हैं। प्रायः इन गीतों में स्त्रियां स्वयं के लिए कुछ नहीं मांगती हैं। उनकी सारी कामनाओं जा केंद्र उनका परिवार है। परिवार की खुशहाली के लिए की गायी देवी प्रार्थनाओं का केंद्र परिवार के पुरुष सदस्य हैं।

एक गीत की बानगी इस प्रकार है-
“माँगेउ सात-पाँच भइया, मैं सात-पाँच भइया
बहिनी अकेली, देवी के मंदिरवा भीतर।।
माँगेउ मैं सात-पाँच देवरा, मैं सात-पाँच देवरा
ननद अकेली, देवी के मंदिरवा भीतर।।
माँगेउ मैं सात-पाँच पुतवा, मैं सात-पाँच पुतवा
कन्या अकेली, देवी के मंदिरवा भीतर।।”

इस गीत में भाई, देवर और पुत्र की अधिक संख्या में की गई मांग बहन, ननद और पुत्री की तुलना में उनके सामाजिक महत्व को जताती है।

स्त्रियों द्वारा लोकेगीतों में की गई कामनायें ये बताती हैं कि पुरुष को बेहतर मनाने की मनोवृत्ति स्त्रियों में कितनी गहरी है।
सीतापुर क्षेत्र में गया जाने वाला देवी गीत कहता है-
“बालक खड़ा मंदिर दुवारे,बालक का विद्या दियौ महारानी।
कन्या खड़ी मंदिर दुवारे, कन्या का जोड़ा दियौ महारानी।।”
एक लड़की के लिए विद्या की तुलना में पति की मनोकामना सारी तस्वीर हमारे सामने रख देती है।

~ नीलिमा

तस्वीर: प्रतीकात्मक है/ साभर फोटो क्लब

पोस्ट स्क्रिप्ट :इस शोधालेख में जिन गीतों का संदर्भ दिया गया है वह डॉ कृष्ण देव उपाध्याय द्वारा संकलित ‘भोजपुरी लोकगीत’, भाग-1के तीसरे संस्करण से लिये गए हैं।यह संकलन हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग (इलाहाबाद) से प्रकाशित है। अवधी क्षेत्र के गीत डॉ महेश प्रताप नारायण अवस्थी के द्वारा संकलित ‘अवधी लोकगीत हजारा’ (चतुर्थ संस्करण,1991) से उधृत हैं।यह भाषा भवन, प्रयाग (इलाहाबाद) से प्रकाशित है।

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