Homeसाहित्यअख़बार ~ गोपाल चोपरा

अख़बार ~ गोपाल चोपरा

अख़बार में ख़बरें नहीं आती,
भयानक हादसे आते है,
दर्दनाक किस्से आते है,
सियासती दाव–पेच आते है।

मैं,
अख़बार नहीं पढ़ता,
मुझे उसमें रुचि भी नहीं,
मुझे फर्क नहीं पड़ता, उसमें क्या आता है क्यां नहीं आता,
फर्क तो उनको भी कुछ नहीं पड़ता,
जो उसे पढ़ते है।

मगर मेरी आंखे खुली है,
मेरा दिल भी खुला है,
वैसे आंखें तो उनकी भी खुली है जो अख़बार पढ़ते है।

मगर,
सड़क पे घटने वाली वारदातो से मुझे फर्क पड़ता है,
मुझे वारदातो में भी रुचि नहीं है,
लेकिन, क्या करू? मैं अनहोनी को चाय कि चुस्की के साथ खुदमे उतारना नहीं जानता।

उन्हें भी सब दिखता है,
सबको सब दिखता है,
फिर,
उनके ज़मीर में क्यों कुछ नहीं होता?

हो सकता है,

सब अंधे है,
सब गूंगे है,
और बहरे भी,
या फिर सब अभिनय कर रहे है अंधे बहरे और गूंगे होने का।

मुझे उनको देखकर तरस आता है,
जो अखबार पढ़ते है,
ख़बरें पीते है चाय के घूंट के साथ,
और इत्मीनान से जम्हाई लेकर अपनी आराम खुर्सी में आंखे मूंद सांस लेते है,
उनकी सांसें भी नकलि होंगी शायद।

– गोपाल।

नज़्म को कविता की केटेगरी में क्यूँ लिया गया है?

वैसे तो उर्दू की हर कविता को नज़्म कहा जा सकता है। पर वर्तमान समय में इसका प्रयोग साधारणतः गज़ल को छोड़कर बाकि कविताओं के लिए होता है। वर्तमान समय में यह शब्द किसी भी विषय पर लिखी गई नए ढंग की कविता के लिए प्रचलित है। मुक्त छंद कविता को आजाद नज़्म कहते हैं।

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