Homeवक्तव्य विशेषकैसा रहा भारत में लाॅकडाउन का प्रभाव? ~ राहुल सेन

कैसा रहा भारत में लाॅकडाउन का प्रभाव? ~ राहुल सेन

हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने कोरोना को रोकने के लिए 80 दिनों का लाॅकडाउन किया जो एक बहुत ही अच्छा कदम था।
जनता को लगा था कि हम 80 दिन घर में रहेंगे तो फिर कोरोना जमीनी स्तर पर कम हो जाएगा लेकिन अफसोस हुआ उसका उल्टा क्योकि 80 दिनो में सरकार ने कोरोना के खिलाफ युद्ध स्तर पर कोई काम नही किया। जनता इतनी भोली जिसने मोदी जी के कहने पर थाली बजा डाली और दीए भी जला दिए।

अब शुरू होता है असली मुद्दा वो है कोरोना को फैलाने का ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए?

पहला नंबर आया जमाती का, जिस पर सरकार ओर मीडिया ने बहुत आक्रामक रूख अपनाया, जब जमाती का मुद्दा धूल में धुमिल हो गया, फिर दूसरा नंबर आया मजदूरो और शराबियो का, उससे भी दाल नही गली तो अब क्या करे?
सरकार ने सोचा सबकुछ खोल कर जनता को ही आत्मनिर्भर बना देते हैं और सारा ठीकरा जनता पर ही फोड़ देंगे और अब ऐसा ही हो रहा है।

जनता को कोरोना के साथ ही आत्मनिर्भर बना कर मरने के लिए छोड़ना था तो 80 दिन के लाॅकडाउन की क्या आवश्यकता थी?

न किसी की नौकरी जाती और न ही अर्थव्यवस्था का इतना बंटाधार होता जो कोरोना से पहले धीमी गति से बंटाधार हो रहा था।
चौकीदार की गलत नीतियों को आज देश दुबारा सामना कर रहा है जहां हमारे मजदूर भाई बहनो को परेशान किया और कुछ मजदूरो की मृत्यु भी हुई उसका जिम्मेदार कौन?
नोटबंदी के दौरान भी जनता को परेशान किया और न जाने कितने लोगो ने अपने प्राण गवाह, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

GST ला कर व्यवसाय का भी बंटाधार किया उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

प्रधानमंत्री आप सवोर्च्च पद पर बैठे हो, इस पद पर बैठ कर समझदारी के साथ फैसले लेने पड़ते हैं, न कि नर्सरी के बच्चे की तरह जो बिना कुछ सोचे समझे आकर रात 8 बजे उंगपटांग घोषणा करे।
समझ के साथ फैसले ले तो बेहतर है।

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